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पर्यावरण विज्ञान

दीवार पर लगी पुरानी पेंट शायद नुक़सान नहीं कर रही — ख़तरा उसे रगड़कर उतारने में है

लेखक ·31 अगस्त 2026·14 मिनट का पठन

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दीवार पर लगी पुरानी पेंट शायद नुक़सान नहीं कर रही — ख़तरा उसे रगड़कर उतारने में है

संक्षेप में: अपारदर्शिता, रंग और जल्दी सूखने के लिए पेंट में सीसा डाला जाता था; भारत के 2016 के नियमों ने घरेलू और सजावटी पेंट में इसे 90 ppm पर बाँध दिया — पर उससे पहले की भारी मात्रा में परत आज भी देश की दीवारों पर है। इस लेख में: साबुत परत कम जोखिम और मरम्मत की धूल ऊँचा जोखिम क्यों है, बच्चों पर असर वयस्कों से कहीं ज़्यादा क्यों, कौन-सी सतहें ख़ुद-ब-ख़ुद सीसे की धूल बनाती हैं, हटाने बनाम ऊपर से सील करने की तुलना, और वे तरीक़े जो रंगाई को ख़तरनाक के बजाय सुरक्षित बनाते हैं।

कल इमारत दोबारा रंगवाने की बात वहीं ख़त्म हुई थी जहाँ हमेशा होती है — तैयारी पर: नई कोटिंग चढ़ाने से पहले पुरानी सतह को ठोस कर लीजिए। सलाह सही है, और लगभग 2017 से पहले रंगी हुई किसी इमारत पर उसके साथ एक गंभीर शर्त जुड़ी है, जो शायद ही कभी किसी को सुनाई देती है।

उस पुरानी परत में सीसा हो सकता है — और ठीक-ठाक मात्रा में। और दीवार पर चुपचाप बैठी वह परत ख़तरा नहीं है। ख़तरा उस पल पैदा होता है जब कोई उस पर पावर सैंडर, तार का ब्रश या ब्लोलैंप चला देता है — यानी ठीक वही, जिसे "सतह ठीक से तैयार करना" कहा जाता है।

पेंट में सीसा डाला ही क्यों जाता था

सीसा कोई अशुद्धि नहीं था। उसे जान-बूझकर डाला जाता था, क्योंकि वह तीन कामों में बेहद अच्छा था।

पिगमेंट। लेड क्रोमेट चमकीले, अपारदर्शी पीले और नारंगी देता है; लेड ऑक्साइड लाल। इन पिगमेंटों की ढकने की ताक़त शानदार थी, बाहर धूप में रंग टिकता था, और जितना क्षेत्रफल ये ढक देते थे उस हिसाब से सस्ते थे।

टिकाऊपन। सीसे वाली फ़िल्में सख़्त होती थीं, अच्छी चिपकती थीं और मौसम झेल जाती थीं — इसीलिए सीसा ठीक उन्हीं पेंटों में जमा हुआ जहाँ टिकाऊपन सबसे ज़रूरी था: बाहरी इनेमल, गेट और ग्रिल, खिड़की के चौखट, दरवाज़े, सीढ़ी की रेलिंग।

सुखाना। एल्किड और तेल-आधारित पेंट में सीसे के यौगिक ड्रायर की तरह इस्तेमाल होते थे, जो उस ऑक्सीकरण को तेज़ करते हैं जिससे गीली फ़िल्म सख़्त होती है।

इसलिए किसी भारतीय इमारत में सीसे वाला पेंट बेतरतीब बिखरा नहीं होता। वह लोहे और लकड़ी के काम पर चढ़े चमकीले इनेमल में जमा है, और चटख पीले, नारंगी व लाल रंगों में — जो, असहज रूप से, बहुत सारे पुराने रंगे हुए फ़र्नीचर, झूले-फिसलपट्टी और स्कूल की लकड़ी के काम का भी रंग-पट है।

नियम असल में कहता क्या है

भारत ने इसे 2016 में नियंत्रित किया। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम के तहत अधिसूचित Regulation of Lead Contents in Household and Decorative Paints Rules घरेलू और सजावटी पेंट में कुल सीसे को 90 पार्ट्स पर मिलियन पर बाँधते हैं, और 1 नवंबर 2017 से लागू हुए।

नब्बे ppm कड़ी सीमा है — यही आँकड़ा दुनिया के सबसे सख़्त नियमों में इस्तेमाल होता है, और यह इतना नीचे है कि इसका व्यावहारिक अर्थ "सीसा मिलाया ही नहीं गया" है। किसी प्रतिष्ठित निर्माता का आज का पेंट इस लेख की समस्या नहीं है।

नियम की दो बातें ठीक-ठीक जानने लायक़ हैं, क्योंकि दोनों को अक्सर ग़लत समझा जाता है।

यह पिछली तारीख़ से लागू नहीं है। यह उस तारीख़ के बाद बने और बिके पेंट पर लागू होता है। उससे पहले चढ़ी हर सीसे वाली परत आज भी दीवार पर है, और इमारतें ख़ुद से दोबारा नहीं रंगतीं। भारत के मकानों की संख्या देखते हुए, 2017 से पहले की चढ़ी हुई पेंट की मात्रा बहुत बड़ी है।

यह घरेलू और सजावटी पेंट को कवर करता है। औद्योगिक कोटिंग — सड़क की पट्टी, संरचनात्मक स्टील, समुद्री और कुछ विशेष उत्पाद — उस ख़ास सीमा के बाहर हैं। यह बात उनके लिए सबसे ज़्यादा मायने रखती है जो औद्योगिक सामग्री घर में इस्तेमाल कर लेते हैं, जो ज़रूरत से ज़्यादा बार होता है।

यह नियम कितनी बड़ी खाई पाट रहा था, इसका अंदाज़ा इससे लगेगा: उससे पहले के वर्षों में भारतीय इनेमल पेंटों की जाँच में बार-बार ऐसे नमूने मिले जो 90 ppm से कई गुना ऊपर थे, और सबसे ख़राब नतीजे चटख पीले और लाल रंगों में आए। यह नियम असली हस्तक्षेप था, औपचारिकता नहीं — और ठीक इसीलिए उससे पहले की चीज़ को गंभीरता से लेना चाहिए।

वह रास्ता जिसकी लगभग कोई उम्मीद नहीं करता

यहीं वह बात है जो बदल देती है कि आपको करना क्या चाहिए।

साबुत, अच्छी तरह चिपकी हुई, ऊपर से रंगी हुई फ़िल्म में मौजूद सीसा कहीं जा नहीं रहा। वह दीवार पर पॉलिमर के ढाँचे में बँधा है। दीवार कोई खा नहीं रहा। आधुनिक इमल्शन के एक कोट के नीचे सील पुरानी फ़िल्म, जन-स्वास्थ्य की भाषा में, ठीक-ठाक तरीक़े से सँभाला गया ख़तरा है।

ख़तरा धूल है। सीसा तब उपलब्ध होता है जब फ़िल्म छेड़ी जाती है और महीन कणों में बदल जाती है, जो फ़र्श, चौखट, खाने की जगहों और हाथों पर बैठ जाते हैं। तीन स्थितियाँ यह करती हैं:

मरम्मत और रंगाई। सूखी पावर सैंडिंग, तार के ब्रश से रगड़ना, खुरचना, और सबसे बुरा — ब्लोलैंप या हीट गन से जलाकर उतारना। सीसे वाली पेंट को जलाना सीसे को वाष्प में बदल देता है और धुआँ पैदा करता है, जो उसे हटाने का सबसे ख़तरनाक तरीक़ा है। सूखी अपघर्षक ब्लास्टिंग भी उतनी ही बुरी है। जोश में की गई एक हफ़्ते के अंत की सतह-तैयारी घर को उससे कहीं ज़्यादा दूषित कर सकती है जितना वह पेंट दशकों तक चुपचाप बैठे रहकर करती।

रगड़ और टकराव वाली सतहें। रंगे हुए चौखट में सरकती खिड़कियाँ, रगड़ खाते दरवाज़े, दराज़ की पटरियाँ, सीढ़ी की रेलिंग और गेट। ये लगातार अपनी ही पेंट को पीसकर चूर्ण बनाती रहती हैं, बिना किसी के कुछ किए। पुराने मकानों में रंगे हुए खिड़की के खाँचे सीसे की धूल का जाना-पहचाना और अच्छी तरह दर्ज स्रोत हैं।

टूटती हुई पेंट। पपड़ी उठती, चूर्ण छोड़ती और उखड़ती फ़िल्म से टुकड़े और पाउडर झड़ते हैं — ख़ासकर नीचे की ऊँचाई पर, जहाँ छोटे बच्चों के हाथ पहुँचते हैं। पेंट के टुकड़ों का स्वाद हल्का मीठा भी होता है, और रसायन की यह अप्रिय बात एक सदी से बच्चों की विषाक्तता में एक कारण रही है।

ध्यान दीजिए कि तीनों बातें फ़िल्म में सीसे की मात्रा से ज़्यादा उसकी हालत और छेड़छाड़ के बारे में हैं। पूरा विषय इसी व्यावहारिक समझ पर घूमता है।

बच्चे ही क्यों

जोखिम बराबर बँटा नहीं है, और फ़र्क़ मामूली नहीं है।

छोटे बच्चे निगले हुए सीसे का वयस्कों से काफ़ी बड़ा हिस्सा सोख लेते हैं, और उनका व्यवहार जोखिम को अधिकतम कर देता है — हाथ फ़र्श पर, हाथ मुँह में, और खेल ठीक उसी ऊँचाई पर जहाँ पेंट के टुकड़े और बैठी हुई धूल जमा होती है। सीसा विकसित होते तंत्रिका तंत्र में पहुँचता है, जहाँ उसका असर समझ, ध्यान और व्यवहार पर पड़ता है — और बाद में संपर्क हटा देने से वह असर पलटता नहीं।

गंभीरता दो तथ्यों से तय होती है। बच्चों में सीसे का कोई सुरक्षित रक्त-स्तर पहचाना नहीं गया है — जिन स्वास्थ्य एजेंसियों ने संदर्भ-स्तर तय किए, उन्होंने सबूत जमा होने के साथ उन्हें बार-बार नीचे किया है, जो ऐसी सीमा का लक्षण है जो किसी को मिल ही नहीं रही। और नुक़सान ख़ामोश है: जिन स्तरों की बात है वहाँ कोई तीव्र बीमारी नहीं होती, ऐसा कुछ नहीं जो माता-पिता को दिखे, और असर सिर्फ़ इस रूप में सामने आता है कि बच्चा उतना अच्छा नहीं कर पाता जितना कर सकता था।

भारत में इसका पैमाना बड़ा है। 2020 के एक व्यापक रूप से उद्धृत आकलन ने अनुमान लगाया था कि भारतीय बच्चों की बहुत बड़ी संख्या का रक्त-सीसा तत्कालीन संदर्भ-स्तर से ऊपर है। पेंट कई स्रोतों में से एक है — लेड-एसिड बैटरी की रीसाइक्लिंग, कुछ मिलावटी मसाले, कुछ बर्तन और प्रसाधन सामग्री भी इसमें हैं — और ईमानदारी की माँग है कि यह कहा जाए कि हर जगह पेंट सबसे बड़ा स्रोत नहीं है। पर यह वही है जो घर के भीतर बैठा है, और यही वह है जिसे मरम्मत का एक फ़ैसला एक ही दोपहर में कई गुना बुरा बना सकता है।

दीवार पर लगी साबुत फ़िल्म सँभाला हुआ ख़तरा है। उसे घिसने का फ़ैसला ही उसे संपर्क में बदलता है। सीसे वाली पेंट के प्रबंधन की लगभग हर सुरक्षित बात इसी एक वाक्य से निकलती है।

छोड़ दीजिए, सील कर दीजिए, या हटाइए

इसे देखते हुए, जवाबों का क्रम वह नहीं है जो सहज लगता है।

छोड़ दीजिए — अगर वह साबुत है और ऐसी जगह है जहाँ कोई छेड़ता नहीं। ठोस, चिपकी हुई पेंट, जो रगड़ वाली सतह पर न हो और छोटे बच्चे की पहुँच में न हो, उस पर नज़र रखनी चाहिए, हमला नहीं करना चाहिए। यह जायज़ जवाब है, टालमटोल नहीं।

एनकैप्सुलेशन। पुरानी फ़िल्म को ऐसी नई कोटिंग के नीचे सील कर देना जो अच्छी तरह चिपके और जिसका रखरखाव होता रहे — यह मान्यता प्राप्त, कम अफ़रा-तफ़री वाला इलाज है, और यहीं कोटिंग समस्या होना छोड़कर उपाय बन जाती है। दो शर्तें हैं। पुरानी फ़िल्म इतनी ठोस होनी चाहिए कि नई को थाम सके; उखड़ती पेंट को सील करना सिर्फ़ मोहलत ख़रीदना है। और उसका रखरखाव होना चाहिए, क्योंकि नाकाम हुआ एनकैप्सुलेंट ठीक वही स्थिति दोबारा बना देता है जिसे वह ढके हुए था। रगड़ वाली सतहों पर यह उपयुक्त भी नहीं, क्योंकि वहाँ नई फ़िल्म पुरानी के साथ ही घिस जाएगी।

ढक दीजिए। रंगे हुए हिस्से के ऊपर नया घटक या क्लैडिंग — नए खिड़की चौखट, किसी सतह पर पैनल — फ़िल्म को कमरे से भौतिक रूप से अलग कर देता है।

हटाइए, सावधानी से — जब पेंट टूट रही हो, रगड़ वाली सतह पर हो, या इमारत का इस्तेमाल बदलकर ऐसा हो गया हो जिसमें छोटे बच्चे आते हों। हटाना सबसे ज़्यादा सुरक्षा देने वाला विकल्प है और वही है जो संपर्क पैदा करता है — इसीलिए यह ज़्यादा मायने रखता है कि कैसे हटाया जा रहा है, बनिस्बत इसके कि हटाया जा रहा है या नहीं।

अगर हटाना ही जवाब है, तो तरीक़े ठोस हैं और वैकल्पिक नहीं:

  • सूखी पावर सैंडिंग नहीं, और जलाना बिलकुल नहीं। सीसे वाली पेंट पर हीट गन या ब्लोलैंप उपलब्ध सबसे बुरा तरीक़ा है। अगर मशीनी औज़ार इस्तेमाल हों ही, तो उनके साथ HEPA फ़िल्टर वाला धूल-निकास लगा होना चाहिए।
  • गीले तरीक़े। सतह पर हल्का पानी छिड़ककर गीला खुरचना हवा में उड़ती धूल नाटकीय रूप से घटा देता है, और इसमें ख़र्च कुछ नहीं।
  • घेराबंदी। फ़र्श पर और दरवाज़ों पर प्लास्टिक शीट; बच्चों, गर्भवती महिलाओं और खाने को उस पूरे समय उस इलाक़े से बाहर रखिए।
  • रासायनिक स्ट्रिपर जहाँ व्यावहारिक हो, घिसाई के बजाय — और कचरा इकट्ठा कीजिए, नाली में मत बहाइए।
  • गीली सफ़ाई। गीले कपड़े से पोंछना और HEPA वैक्यूम, झाड़ू नहीं। झाड़ू ठीक उसी आकार के कणों को दोबारा फैला देता है जो मायने रखते हैं।
  • व्यक्तिगत स्वच्छता। कपड़े बदलिए, खाने से पहले हाथ धोइए, और काम के कपड़े रहने की जगह में मत लाइए — यह वही "घर तक साथ आने वाला" रास्ता है जो औद्योगिक सीसा-काम में दशकों से दर्ज है।

जाँच मौजूद है और उसके बारे में जानना काम का है: हाथ में पकड़ने वाले XRF विश्लेषक फ़िल्म को नुक़सान पहुँचाए बिना, वहीं के वहीं सीसा पढ़ लेते हैं, और प्रयोगशालाएँ पेंट के टुकड़े की जाँच कर देती हैं। किसी पुरानी इमारत में बड़ी मरम्मत से पहले — और स्कूल, क्रेच या बच्चों के अस्पताल में तो निश्चित रूप से — यह जाँच उस फ़ैसले के मुक़ाबले सस्ती है जिसके लिए वह की जा रही है।

यह बाक़ी सब से कहाँ जुड़ता है

इस शृंखला के पहले के दो सिरे सीधे इसमें से गुज़रते हैं।

पहला यह कि कोटिंग रसायन में यही कहानी अब चौथी बार आ रही है: कोई पदार्थ इसलिए अपनाया जाता है कि वह किसी भौतिक काम में सचमुच बेहतरीन है, फिर उसकी विषाक्तता उसे पकड़ लेती है, और उद्योग को ऐसा विकल्प ढूँढना पड़ता है जो शुरू में कभी उतना अच्छा नहीं होता। पेंट में सीसा, करोज़न प्राइमर में क्रोमेट, कैन लाइनिंग में बिसफ़ेनॉल A, कपड़े की फ़िनिश में फ़्लोरो-रसायन। यह पैटर्न इतना नियमित है कि इससे अनुमान लगाया जा सके — और समझदार निष्कर्ष यह नहीं है कि कोटिंग ख़तरनाक होती हैं; निष्कर्ष यह है कि "हम इसे दशकों से इस्तेमाल कर रहे हैं और सब ठीक है" तर्क के रूप में बहुत कमज़ोर रिकॉर्ड रखता है।

दूसरा यह कि सतह की तैयारी को जितना सोचा जाता है उससे ज़्यादा सोचने लायक़ क्यों है। कल के लेख का तर्क था कि तैयारी तय करती है कि रंगाई टिकेगी या नहीं। यह लेख इसमें यह जोड़ता है कि पुरानी इमारत पर तैयारी यह भी तय करती है कि रंगाई सुरक्षित है या नहीं। दोनों प्रोजेक्ट की शुरुआत में पड़े उसी उपेक्षित आधे दिन की ओर इशारा करते हैं।

छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए यह क्यों मायने रखता है

इस क्षेत्र में उसकी कम चर्चा के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा सुलभ और उपयोगी काम पड़ा है।

सबसे मूल्यवान है बेरौनक़ संपर्क-मानचित्रण: भारतीय शहरों में बच्चों का सीसा-संपर्क असल में किस तरह के भवन-भंडार, किन सतहों और किन मरम्मत-प्रथाओं से चलता है — बाक़ी स्रोतों से अलग करके। नीति का सवाल कि हस्तक्षेप का एक रुपया कहाँ सबसे ज़्यादा काम करेगा, इसके बिना जवाब नहीं पा सकता, और यह महँगे उपकरण नहीं, मैदानी काम माँगता है।

पदार्थ की तरफ़, एनकैप्सुलेंट का प्रदर्शन सचमुच कम अध्ययन हुआ है। भारतीय तापमान और आर्द्रता के चक्रों में सील करने वाला कोट नीचे की सीसे वाली फ़िल्म को कितने समय तक भरोसे के साथ रोके रखता है; कौन-से चिपकाव और लचीलेपन के गुण इसका पूर्वानुमान देते हैं; और ऐसे उत्पाद का स्पेसिफ़िकेशन और सत्यापन कैसे हो? ये जवाब देने योग्य सवाल हैं जिनका जन-स्वास्थ्य लाभ तुरंत मिलता है।

एक उपकरण का दरवाज़ा भी है: पेंट में सीसे की सस्ती मैदानी जाँच। XRF असरदार है और महँगा। स्वीकार्य संवेदनशीलता वाला सस्ता तरीक़ा, जिसे विशेषज्ञ नहीं बल्कि नगरपालिका का कर्मचारी इस्तेमाल कर सके, पैमाने पर जो संभव है उसे बदल देगा — और विश्लेषणात्मक रसायन के विभाग इसे आज़माने की अच्छी स्थिति में हैं।

और एक सीधा अनुपालन का सवाल है जिस पर किसी का समय लगना चाहिए: 2017 के बाद बाज़ार की निगरानी। क्या बिक रहे पेंट 90 ppm पूरा कर रहे हैं, अनौपचारिक और छोटे निर्माताओं के हिस्से में भी? समय-समय पर स्वतंत्र जाँच ठीक वैसा काम है जो कोई विश्वविद्यालय समूह भरोसे के साथ कर सकता है — और अच्छे नियम को ईमानदार बनाए रखने का यही तरीक़ा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कैसे पता करें कि मेरी पुरानी पेंट में सीसा है?

देखकर नहीं बता सकते, और रंग जवाब नहीं, संकेत भर है — चटख पीले, नारंगी और लाल, तथा लोहे और लकड़ी के काम पर चमकीला इनेमल, ज़्यादा संभावना वाले मामले हैं। सबसे मज़बूत संकेत उम्र है: भारत में लगभग 2017 से पहले लगी पेंट उस सीमा से पुरानी है। पक्का जवाब वहीं लिए गए XRF पाठ या किसी टुकड़े की प्रयोगशाला जाँच से मिलता है — और पुरानी इमारत की बड़ी मरम्मत से पहले वह जाँच करा लेना सही है।

क्या सीसे वाली पेंट वाले घर में रहना सुरक्षित है?

आम तौर पर हाँ, अगर पेंट साबुत है और उसका रखरखाव है। ठोस, अच्छी तरह चिपकी फ़िल्म जिसे कोई घिस नहीं रहा, और जो रगड़ वाली सतह पर नहीं है, बहुत कम संपर्क देती है। तस्वीर तब बदलती है जब पेंट टूटने लगे, वह रगड़ वाली सतह पर हो, या मरम्मत शुरू हो। व्यावहारिक उपाय सीधे और असरदार हैं: रंगी हुई सतहों की मरम्मत बनाए रखिए, फ़र्श और खिड़की की चौखट झाड़ू के बजाय गीले पोंछे से साफ़ कीजिए, बच्चों के हाथ खाने से पहले धुलवाइए, और खिलौने ऐसे फ़र्श से दूर रखिए जहाँ पेंट की धूल बैठ सकती है।

क्या मैं बस उसके ऊपर पेंट कर सकता हूँ?

अक्सर हाँ, और यह कई बार बेहतर विकल्प है। ठोस और रखरखाव वाली कोटिंग के नीचे सील करना मान्यता प्राप्त इलाज है। शर्तें ये हैं कि मौजूदा फ़िल्म इतनी स्थिर हो कि नई को थाम सके, नई कोटिंग का रखरखाव होता रहे और वह भुला न दी जाए, और रगड़ वाली सतहों पर यह उपयुक्त नहीं जहाँ दोनों फ़िल्में पिसकर चूर्ण बन जाएँगी। उखड़ती पेंट पर पेंट कर देना एनकैप्सुलेशन नहीं है; वह मोहलत है।

क्या आजकल का पेंट सुरक्षित है?

नियम लागू होने के बाद भारतीय बाज़ार के लिए बना घरेलू और सजावटी पेंट कुल सीसे में 90 ppm पर बँधा है, जिसका व्यावहारिक अर्थ है कि सीसा मिलाया नहीं गया, और प्रतिष्ठित निर्माता अनुपालन की घोषणा करते हैं। सावधानी बची रहती है औद्योगिक कोटिंग के लिए, जो उस ख़ास सीमा के बाहर हैं, और अनौपचारिक या बिना ब्रांड वाले उत्पाद के लिए, जहाँ अनुपालन जाँचना कठिन है। अगर आधुनिक पेंट ऐसी जगह लग रहा है जहाँ बच्चा रहेगा, तो ऐसे निर्माता से ख़रीदना जो अपना अनुपालन घोषित करता हो, वाजिब एहतियात है।

पुरानी पेंट के साथ सबसे ख़तरनाक काम क्या है?

हीट गन या ब्लोलैंप से जलाकर उतारना, और उसके ठीक पीछे सूखी पावर सैंडिंग। दोनों एक स्थिर फ़िल्म को एक दोपहर के भीतर साँस में जाने लायक़ धुएँ या महीन धूल में बदल देते हैं — बंद कमरे में, और आम तौर पर तब जब परिवार वहीं रह रहा होता है। इस लेख से अगर एक ही बात लेनी हो, तो यह कि सीमा से पुरानी पेंट पर ये दो तरीक़े कभी इस्तेमाल नहीं होने चाहिए।