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नर्सिंग

नवजात को पहले घंटे में जो चाहिए, उसका ज़्यादातर मुफ़्त है। और उसकी जगह जो किया जाता है, उसमें कई चीज़ें नुक़सान करती हैं।

लेखक ·6 सितंबर 2026·10 मिनट का पठन

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नवजात को पहले घंटे में जो चाहिए, उसका ज़्यादातर मुफ़्त है। और उसकी जगह जो किया जाता है, उसमें कई चीज़ें नुक़सान करती हैं।

संक्षेप में: जन्म के बाद का पहला घंटा वह समय है जब बेहद कम ख़र्च वाले कुछ फ़ैसले नवजात के जीवित रहने और स्वास्थ्य पर असाधारण असर डालते हैं। यह लेख बताता है कि देर से गर्भनाल काटना महीनों तक आयरन क्यों बढ़ाता है, त्वचा-से-त्वचा संपर्क भावुकता नहीं बल्कि ऊष्मा-देखभाल क्यों है, नवजात गर्मी कैसे खोता है और जल्दी नहलाना क्यों हानिकारक है, छोटे शिशुओं के लिए तत्काल कंगारू मदर केयर पर प्रमाण क्या कहते हैं, प्री-लैक्टियल फ़ीड कोलोस्ट्रम को कैसे हटा देते हैं, और कौन-सी पुरानी प्रथाएँ छोड़ दी गई हैं।

प्रसव कक्ष की एक तस्वीर लगभग सबके मन में फ़िल्मों से बैठी है: बच्चे को उठाकर अलग किया जाता है, उल्टा लटकाया जाता है, थपकी मारकर रुलाया जाता है, साफ़ किया जाता है, तौला जाता है, कंबल में लपेटकर सौंप दिया जाता है। इस क्रम की लगभग हर कड़ी या तो ग़ैर-ज़रूरी है या सीधे-सीधे नुक़सानदेह — और यह बताने वाले प्रमाण वर्षों से तय हैं।

जन्म के बाद के पहले घंटे पर लिखने लायक़ बात यह नहीं है कि उसमें महँगे हस्तक्षेप चाहिए। बात इसकी उलटी है। जिन तरीक़ों के पीछे सबसे मज़बूत प्रमाण हैं, वे लगभग मुफ़्त हैं — यानी सर्वोत्तम व्यवहार और प्रचलित व्यवहार के बीच की खाई पैसे की नहीं, जानकारी और आदत की है। और यही वह खाई है जिसे कोई लेख सचमुच थोड़ा पाट सकता है।

वह एक मिनट, जो बच्चे के अगले छह महीने बदल देता है

जन्म के क्षण बच्चे के ख़ून का अच्छा-ख़ासा हिस्सा अब भी गर्भनाल और प्लेसेंटा में होता है। नाल तुरंत काट दी जाए तो वह ख़ून वहीं रह जाता है और फेंक दिया जाता है।

रुक जाने से प्लेसेंटल ट्रांसफ़्यूज़न होता है — पहले कुछ मिनटों में नवजात के रक्त-आयतन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा उसके शरीर में आ जाता है, और आयरन उसके साथ आता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफ़ारिश है कि जिन शिशुओं को पुनर्जीवन की ज़रूरत नहीं, उनमें नाल जन्म के एक मिनट से पहले न काटी जाए — और फ़ायदा प्रसव कक्ष तक सीमित नहीं रहता: जन्म के समय बेहतर आयरन भंडार का मतलब है महीनों बाद ख़ून की कमी की साफ़ कम दर, जो ऐसे देश में बेहद मायने रखता है जहाँ बच्चों में एनीमिया लगभग सार्वभौमिक है। समय से पहले जन्मे शिशुओं में प्रमाण और मज़बूत हैं — मृत्यु दर और रक्त चढ़ाने की ज़रूरत, दोनों घटती हैं।

पहले इसके ख़िलाफ़ तर्क पीलिया का दिया जाता था। देर से नाल काटने से फ़ोटोथेरेपी की ज़रूरत वाले पीलिया की दर थोड़ी बढ़ती है — और फ़ोटोथेरेपी किसी भी ऐसी सुविधा में संभाली जा सकने वाली, इलाज-योग्य स्थिति है जहाँ वह उपलब्ध हो। एक इलाज-योग्य स्थिति में थोड़ी बढ़त बनाम महीनों तक बेहतर आयरन — यह कोई कड़ा मुक़ाबला नहीं है, इसीलिए दिशानिर्देश बदले।

एक बारीकी याद रखने लायक़ है: जो बच्चा साँस नहीं ले रहा उसे पुनर्जीवन चाहिए, और वह पहले आता है। यह सिफ़ारिश सामान्य मामलों के लिए है, संकट में फँसे बच्चे पर घड़ी देखने के लिए नहीं।

माँ की छाती एक ऊष्मा-यंत्र है

नवजात गर्मी खोने में बहुत कुशल है और बनाने में कमज़ोर। उसके द्रव्यमान के मुक़ाबले सतह बड़ी है, वह गीला आता है, और वह काँप नहीं सकता — उसे ब्राउन फ़ैट जलाने पर निर्भर रहना पड़ता है, जो सीमित भंडार है। सामान्य वातानुकूलित तापमान वाले प्रसव कक्ष में बिना पोंछा नवजात चिंताजनक तेज़ी से ठंडा पड़ सकता है।

नवजातों में हाइपोथर्मिया उन कारणों में है जिन्हें बीमारी और मौत के पीछे सबसे कम पहचाना जाता है। यह मुख्यतः ठंडे इलाक़ों की समस्या नहीं है; यह गरम जगहों पर भी नियमित रूप से होता है, क्योंकि तुलना मौसम से नहीं, शरीर के तापमान से है।

इसका जवाब वह क्रम है जिसे कभी-कभी "वार्म चेन" कहा जाता है: कमरा गरम रखिए, बच्चे को तुरंत और अच्छी तरह पोंछिए, गीला कपड़ा हटा दीजिए — बच्चे पर पड़ा गीला तौलिया वाष्पीकरण से उसे ठंडा करता रहता है — और बच्चे को सीधे माँ की त्वचा से लगाकर, सूखे कपड़े और टोपी से ढककर रखिए। माँ की छाती तापमान के हिसाब से जवाब देती है: ठंडे बच्चे को गरम करती है और गरम बच्चे को ज़्यादा गरम नहीं करती। यहीं बच्चा वार्ड के नहीं, माँ के जीवाणुओं से बसता है, और यहीं वे प्रतिवर्त शुरू होते हैं जो पहले स्तनपान तक ले जाते हैं।

और यहीं वह परंपरा आती है जो यह सब उलट देती है। नवजात को पहले कुछ घंटों में नहलाना नुक़सानदेह है, और दिशानिर्देश कहते हैं कि पहला स्नान कम से कम चौबीस घंटे टाला जाए। नहलाना ठीक उसी क्षण बच्चे को ठंडा करता है जब वह सबसे कमज़ोर है, और वह वर्निक्स धो देता है — वह सफ़ेद परत, जिसके सुरक्षात्मक और नमी बनाए रखने वाले काम हैं। जहाँ जल्दी नहलाना सांस्कृतिक रूप से अपेक्षित है, वहाँ उसे टलवाना नर्स या दाई की सबसे क़ीमती बातचीत में से एक है।

सबसे छोटे शिशुओं के लिए तुरंत संपर्क

दशकों तक छोटे या समय-पूर्व जन्मे शिशु के लिए क्रम यही था: पहले इनक्यूबेटर में स्थिर कीजिए, माँ से संपर्क बाद में।

यह बदल चुका है, और बदलाव के पीछे के प्रमाण असामान्य रूप से मज़बूत हैं। तत्काल कंगारू मदर केयर पर कई देशों में हुए एक बड़े परीक्षण ने — जिसमें माँ से लगातार त्वचा-से-त्वचा संपर्क बच्चे के नैदानिक रूप से स्थिर होने से पहले शुरू किया गया — कम वज़न वाले शिशुओं में पारंपरिक देखभाल के मुक़ाबले मृत्यु दर में बड़ी कमी दर्ज की। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मार्गदर्शन अब कहता है कि समय-पूर्व और कम वज़न वाले शिशुओं में कंगारू मदर केयर जन्म के तुरंत बाद शुरू की जाए, स्थिरता का इंतज़ार किए बिना।

भारत में इसका महत्व लगभग किसी भी और जगह से ज़्यादा है। दुनिया में समय-पूर्व जन्मों की सबसे बड़ी निरपेक्ष संख्या यहीं दर्ज होती है, और कंगारू मदर केयर वह उपाय है जो ज़िला अस्पताल में उतना ही चलता है जितना किसी बड़े संस्थान में — क्योंकि यहाँ उपकरण माँ ही है।

पहला आहार, और उसकी जगह क्या ले लेता है

पहले घंटे में स्तनपान इस सूची की दूसरी सबसे क़ीमती चीज़ है। जल्दी चूसना दूध बनना भी बढ़ाता है और गर्भाशय के संकुचन में भी मदद करता है — और पहला तरल, कोलोस्ट्रम, दूध का घटिया संस्करण नहीं है। यह गाढ़ा, एंटीबॉडी से भरा स्राव है, मात्रा में थोड़ा, और भोजन से ज़्यादा एक प्रतिरक्षा-ख़ुराक के क़रीब। मात्रा का कम होना उपयुक्त ही है — नवजात के पेट में कुछ मिलीलीटर ही समाते हैं।

इसके ख़िलाफ़ दो धारणाएँ काम करती हैं। पहली, कि कोलोस्ट्रम बासी या गंदा है और उसे निचोड़कर फेंक देना चाहिए। दूसरी, कि दूध "उतरने" तक बच्चे को कुछ और चाहिए — शहद, चीनी का पानी, गुड़, घुट्टी, पशु का दूध। ये प्री-लैक्टियल फ़ीड कोलोस्ट्रम की जगह ले लेते हैं, संक्रमण का ख़तरा लाते हैं, और ठीक उसी समय चूसना घटा देते हैं जब चूसना ही दूध की आपूर्ति तय करता है। शहद के साथ शिशु बोटुलिज़्म का अलग ख़तरा जुड़ा है और उसे पहले साल में बिलकुल नहीं देना चाहिए।

भारत के अपने सर्वेक्षण आँकड़े बताते हैं कि गुंजाइश कितनी है: पहले घंटे में स्तनपान शुरू होने का आँकड़ा राष्ट्रीय स्तर पर क़रीब चालीस फ़ीसदी के आसपास है, और छह महीने तक केवल स्तनपान लगभग दो-तिहाई। दोनों सुधरे हैं, और दोनों में बच्चों की बड़ी आबादी ऐसी चीज़ से वंचित रह जाती है जिसे देने में कुछ ख़र्च नहीं होता।

स्वस्थ नवजात को पहले घंटे में जो चाहिए, उसका लगभग सब कुछ कमरे में पहले से मौजूद है। हुनर यह जानने में है कि कौन-सा हस्तक्षेप नहीं करना है।

जो प्रथाएँ छोड़ दी गईं

कभी मानक रहीं कई प्रथाएँ अब सिफ़ारिश में नहीं हैं, और उनकी वजह जानना काम का है, क्योंकि वे अब भी चलती हैं।

बच्चे को उल्टा लटकाकर थपकी मारने से कुछ हासिल नहीं होता; जो बच्चा साँस नहीं ले रहा उसे जल्दी से वायुमार्ग सही स्थिति में लाना और साँस देना चाहिए, थपकी नहीं। रोते-चीख़ते बच्चे के मुँह और नाक की नियमित सक्शनिंग भी सिफ़ारिश में नहीं है — यह ऐसा प्रतिवर्त छेड़ सकती है जो धड़कन धीमी कर दे, और रोते बच्चे में उसकी ज़रूरत ही नहीं। तौलने-नापने के लिए माँ से अलग करना एक घंटा रुक सकता है; उसमें कुछ भी अत्यावश्यक नहीं।

कुछ चीज़ें जोड़ी भी जाती हैं, और वे छोटी हैं। जन्म पर विटामिन K विटामिन K की कमी से होने वाले रक्तस्राव को रोकता है, जो दुर्लभ पर विनाशकारी है, और यह एक इंजेक्शन भर है। नाल की देखभाल न्यूनतम है — साफ़ और सूखी रखी जाए, उस पर कोई पारंपरिक लेप न लगाया जाए; हालाँकि संक्रमण के ऊँचे ख़तरे वाले समुदायों में भारत में क्लोरहेक्सिडीन लगाना कार्यक्रम के तहत इस्तेमाल होता है। और जो नवजात एक मिनट पर साँस नहीं ले रहा, उसे उसी खिड़की के भीतर सहायक वेंटिलेशन चाहिए — यही सिद्धांत भारत के अपने नवजात पुनर्जीवन प्रशिक्षण कार्यक्रम के पीछे है।

विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह क्यों मायने रखता है

एक साल से कम उम्र में होने वाली मौतों का बहुमत नवजात मौतें हैं, और उनका भी बहुमत पहले हफ़्ते में होता है — यानी देश की बाल मृत्यु दर का असाधारण हिस्सा घंटों और दिनों में नपी एक खिड़की के भीतर बैठा है। इसे संभालने वाले उपाय सस्ते और ज्ञात हैं। जो कमी है वह व्यवहार में निरंतरता की है, और वह तकनीक की नहीं, नर्सिंग तथा मिडवाइफ़री शोध की समस्या है।

काम के शोध-प्रश्न सादे और स्थानीय हैं। किसी एक सुविधा में कितने प्रतिशत शिशुओं को सचमुच देर से नाल कटना, बिना टूटा त्वचा-से-त्वचा संपर्क और एक घंटे के भीतर स्तनपान मिलता है — रजिस्टर की प्रविष्टि से नहीं, प्रत्यक्ष अवलोकन से नापा गया, क्योंकि दोनों अक्सर आपस में मेल नहीं खाते। व्यस्त लेबर वार्ड में असली अड़चनें क्या हैं: स्टाफ़, कमरे की बनावट, प्रसव मेज़ और वॉर्मर के बीच की दूरी, शिफ़्ट बदलने का समय। किसी समुदाय में जल्दी नहलाने की परंपरा किस तरह की काउंसलिंग सचमुच बदलती है, और किससे सिर्फ़ शिष्ट सहमति मिलती है। और यह कि प्रोटोकॉल में छोटा-सा बदलाव आँकड़े हिलाता है या नहीं, और छह महीने बाद वह बदलाव टिका या नहीं।

यही काम — गर्भावस्था, प्रसव, प्रसवोत्तर काल और नवजात की देखभाल, व्यक्तियों, परिवारों और समुदायों के संदर्भ में — इंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ मिडवाइफ़री नर्सिंग एंड प्रैक्टिसेज़ (ISSN 2584-0800) का दायरा है, जो 2015 में शुरू हुई पीयर-रिव्यूड हाइब्रिड ओपन-एक्सेस जर्नल है। नर्सिंग और मिडवाइफ़री के विद्यार्थियों के लिए जन्म के बाद का पहला घंटा नैदानिक व्यवहार में इस बात का सबसे साफ़ उदाहरण है कि प्रमाण-आधारित देखभाल अक्सर कम करने और ज़्यादा ध्यान देने का मामला है — और यह भी कि एक लेबर वार्ड से ढंग से दर्ज किया गया अवलोकन-अध्ययन साहित्य की एक और समीक्षा से ज़्यादा क़ीमती हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गर्भनाल देर से काटने की सिफ़ारिश क्यों की जाती है?

क्योंकि जन्म के समय नवजात के ख़ून का अच्छा-ख़ासा हिस्सा अब भी प्लेसेंटा में होता है, और कम से कम एक मिनट रुकने से वह आयरन समेत बच्चे के शरीर में आ जाता है। इससे आयरन भंडार बढ़ता है और महीनों बाद एनीमिया की दर घटती है; समय-पूर्व जन्मे शिशुओं में फ़ायदा और ज़्यादा है।

क्या देर से नाल काटने से पीलिया होता है?

इससे फ़ोटोथेरेपी की ज़रूरत वाले पीलिया की दर थोड़ी बढ़ती है, जिसका इलाज आसान है। दिशानिर्देश यह अदला-बदली इसलिए स्वीकार करते हैं कि आयरन का लाभ महीनों चलता है और जहाँ फ़ोटोथेरेपी उपलब्ध है वहाँ पीलिया संभालने लायक़ है।

नवजात को तुरंत क्यों नहीं नहलाना चाहिए?

क्योंकि नहलाना ठीक उस समय बच्चे को ठंडा करता है जब वह अपना तापमान सबसे कम संभाल पाता है, और वह वर्निक्स हटा देता है, जो सुरक्षात्मक है। दिशानिर्देश पहला स्नान कम से कम चौबीस घंटे टालने को कहते हैं।

कंगारू मदर केयर क्या है?

बच्चे का माँ की छाती से लगातार त्वचा-से-त्वचा संपर्क, जिसमें बच्चा ढका रहता है और आम तौर पर माँग के अनुसार दूध पीता है। समय-पूर्व और कम वज़न वाले शिशुओं के लिए मौजूदा WHO मार्गदर्शन इसे जन्म के तुरंत बाद शुरू करने को कहता है, स्थिर होने का इंतज़ार किए बिना।

कोलोस्ट्रम क्यों ज़रूरी है?

कोलोस्ट्रम जन्म के बाद बनने वाला पहला, गाढ़ा, एंटीबॉडी से भरा स्राव है। मात्रा में कम होना नवजात के पेट की क्षमता के अनुकूल है, और यह बड़े हद तक प्रतिरक्षा-ख़ुराक की तरह काम करता है। उसे फेंक देना या उसकी जगह प्री-लैक्टियल फ़ीड देना वह सुरक्षा हटा देता है।

क्या नवजात को शहद, चीनी का पानी या घुट्टी देना सुरक्षित है?

नहीं। प्री-लैक्टियल फ़ीड कोलोस्ट्रम की जगह ले लेते हैं, संक्रमण का ख़तरा लाते हैं और वह चूसना घटाते हैं जिससे दूध की आपूर्ति बनती है। शहद के साथ शिशु बोटुलिज़्म का अलग ख़तरा है और उसे पहले साल में बिलकुल नहीं देना चाहिए।