बीस साल बाद ग्राफीन: वो 'चमत्कारी मटेरियल' असल में कहाँ काम आ रहा है
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संक्षेप में: ग्राफीन — कार्बन की एक परमाणु-मोटी परत — बेहद मज़बूत और चालक है, पर दो दशक बाद इसका असली असर कम्पोज़िट, कोटिंग, बैटरी, इंक और सेंसर में है, सिलिकॉन चिप की जगह लेने में नहीं — क्योंकि इसे बड़े पैमाने पर बनाना कठिन है और इसमें प्राकृतिक बैंड गैप नहीं है।
बहुत कम मटेरियल इतने शोर के साथ आए हैं जितना ग्राफीन। जब Andre Geim और Konstantin Novoselov ने University of Manchester में एक परमाणु-मोटी कार्बन शीट अलग की — जिसके लिए उन्हें 2010 का भौतिकी नोबेल मिला — तो हर तरफ़ यह कहा गया कि यह अनटूटने वाले फ़ोन से लेकर स्पेस एलेवेटर तक सब कुछ बना देगा। दो दशक बाद एक शांत सवाल पूछना ज़रूरी है: ग्राफीन ने असल में क्या दिया?
पहले एक याद — यह है क्या
ग्राफीन कार्बन परमाणुओं की एक ऐसी परत है जो मधुमक्खी के छत्ते जैसी षट्भुज (honeycomb) संरचना में सजी होती है — वही कार्बन जो आपकी पेंसिल में ग्रेफ़ाइट बनकर परत-दर-परत जमा रहता है, बस यहाँ सिर्फ़ एक परमाणु मोटा। इसी बनावट से इसे ख़ास गुण मिलते हैं: यह अपने वज़न के हिसाब से बेहद मज़बूत है, गर्मी और बिजली बहुत अच्छी तरह conduct करता है, और लगभग पारदर्शी है।
काग़ज़ पर यह एक सपने जैसा स्पेसिफ़िकेशन है। असली कहानी "काग़ज़ पर" और "हाथ में" के बीच के फ़ासले में छिपी है।
आज ग्राफीन असल में कहाँ दिखता है
ईमानदार तस्वीर शुरुआती चर्चा जितनी फ़िल्मी नहीं, पर ज़्यादा काम की है।
- कम्पोज़िट और कोटिंग। पॉलिमर, कंक्रीट और पेंट में थोड़ी मात्रा में ग्राफीन मिलाने से मज़बूती, चालकता या जंग-रोधकता बढ़ती है। यह सबसे ज़्यादा व्यावसायिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में से एक है।
- बैटरी और सुपरकैपेसिटर। ग्राफीन और इससे मिलते-जुलते मटेरियल ऊर्जा-भंडारण इलेक्ट्रोड में चालकता और सतह-क्षेत्र बढ़ाने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
- कंडक्टिव इंक और सेंसर। छपाई-योग्य ग्राफीन इंक से लचीले सर्किट और संवेदनशील सेंसर बनते हैं।
- खेल का सामान और ख़ास उत्पाद। कुछ टेनिस रैकेट, साइकिल के पुर्ज़े और जूतों के तले पहले से ग्राफीन-युक्त होने का दावा करते हैं।
इसने सिलिकॉन की जगह रातों-रात क्यों नहीं ली
दो रुकावटों ने सबसे बड़ी भविष्यवाणियों को धीमा किया।
पहली, अच्छी गुणवत्ता की शीट बड़े पैमाने पर बनाना कठिन है। सस्ता ग्राफीन अक्सर कई परतों वाले फ़्लेक होते हैं; शुद्ध एक-परत ग्राफीन महँगा और लगातार बनाना मुश्किल है।
दूसरी, ग्राफीन में प्राकृतिक बैंड गैप नहीं है। यही गुण, जो चालकता के लिए शानदार है, डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स की on/off स्विचिंग के लिए दिक़्क़त बन जाता है — इसलिए इसने चिप में सिलिकॉन की जगह सीधे नहीं ली।
ग्राफीन का सबक़ यह नहीं कि चर्चा ग़लत थी, बल्कि यह कि वह वक़्त से पहले थी। मटेरियल खोज से रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक दशकों में पहुँचते हैं, प्रेस रिलीज़ में नहीं।
भारत के लिए इसका क्या मतलब
ग्राफीन पर शोध भारतीय संस्थानों में सक्रिय है, और भारत के पास ग्रेफ़ाइट के बड़े भंडार हैं — यानी कच्चा माल। छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए ग्राफीन एक समृद्ध प्रशिक्षण-भूमि है: यह सिखाता है कि किसी मटेरियल की चमकदार भौतिकी कैसे निर्माण की ज़िद्दी अर्थव्यवस्था से टकराती है। यही तनाव, किसी एक उत्पाद से ज़्यादा, अब तक ग्राफीन की असली विरासत है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ग्राफीन क्या है?
ग्राफीन कार्बन परमाणुओं की एक परत है जो षट्भुज (honeycomb) संरचना में सजी होती है — वही कार्बन जो ग्रेफ़ाइट में होता है, बस एक परमाणु मोटा। यह अपने वज़न के हिसाब से बहुत मज़बूत है, गर्मी-बिजली अच्छी तरह conduct करता है और लगभग पारदर्शी है।
ग्राफीन आज असल में कहाँ इस्तेमाल होता है?
इसके सबसे सक्रिय व्यावसायिक उपयोग हैं — कम्पोज़िट, कोटिंग और कंक्रीट में मिलावट के रूप में, तथा बैटरी, सुपरकैपेसिटर, कंडक्टिव इंक और सेंसर में — साथ ही कुछ खेल का सामान। सिलिकॉन चिप की जगह लेने जैसे बड़े दावे अभी पूरे नहीं हुए।
ग्राफीन ने इलेक्ट्रॉनिक्स में सिलिकॉन की जगह क्यों नहीं ली?
क्योंकि ग्राफीन में प्राकृतिक बैंड गैप नहीं है, जिससे डिजिटल लॉजिक की on/off स्विचिंग मुश्किल हो जाती है। साथ ही अच्छी गुणवत्ता की एक-परत ग्राफीन अब भी महँगी और लगातार बड़े पैमाने पर बनाना कठिन है।